महेश्वर, मध्य प्रदेश
हमारी कहानी
नर्मदा के उत्तरी तट पर, अहिल्या क़िले के नीचे, महेश्वर 18वीं सदी से बुन रहा है।

रानी अहिल्याबाई होलकर ने बुनकरों को अपनी राजधानी में बुलाया और उनसे राजदरबार और मेहमानों के लायक़ कपड़ा माँगा। उन्होंने जो बुना — दो-तरफ़ा पल्लू वाला हल्का सिल्क-कॉटन, जिसके किनारे क़िले की नक़्क़ाशी से लिए गए — वही माहेश्वरी साड़ी बन गया।
हम महेश्वर के बाज़ार चौक का एक बुनकर घराना हैं। हमारा परिवार दशकों से उन्हीं करघों से माहेश्वरी साड़ियाँ, सूट और ड्रेस मटीरियल बेच रहा है। Zari Buta के ज़रिए हम उन्हें — और चंदेरी, वाराणसी और कच्छ की बुनाइयों को — सीधे आप तक पहुँचाते हैं।
हर पीस की करघा ID क्यों होती है
एक हथकरघा साड़ी बुनने में कई दिन लगते हैं और उसमें एक बुनकर का हाथ होता है। हम उस करघे और बुनकर का रिकॉर्ड रखते हैं और दोनों को प्रोडक्ट पेज पर लिखते हैं। यही हमारा सबूत है कि आपके हाथ में जो पीस है वह करघे से आया है, पावरलूम मिल से नहीं।
Zari
Buta
Handloom Wear
धागे से आपके दरवाज़े तक
- धागामहीन कॉटन और सिल्क के धागे, छोटे-छोटे लॉट में रंगे हुए।
- तानाताना हाथ से फैलाकर करघे पर पिरोया जाता है।
- बुनाईकिनारे, बूटे और पल्लू धागा-धागा बुने जाते हैं।
- फ़िनिशहर पीस जाँचा, प्रेस किया और उसकी करघा ID के साथ टैग किया जाता है।
हमारी दुकान पर आइए
बाज़ार चौक, महेश्वर में हमारी दुकान पर आइए, या समय जानने या वीडियो कॉल के लिए WhatsApp पर मैसेज करें।
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